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वह दिन - एक सच्चा अनुभव

 सुनें 👇


उस दिन मेरे भाई ने दुकान से फ़ोन किया की वह अपना बैग घर में भूल गया है ,जल्दी से वह बैग दुकान पहुँचा दो । मैं उसका बैग लेकर घर से मोटरसाईकल पर दुकान की तरफ निकला। अभी आधी दुरी भी पार नहीं हुआ था की मोटरसाइकल की गति अपने आप धीरे होने लगी और  थोड़ी देर में मोटरसाइकिल बंद हो गयी। मैंने चेक किया तो पाया की मोटरसाइकल का पेट्रोल ख़त्म हो गया है। मैंने सोचा ये कैसे हो गया ! अभी कल तो ज्यादा पेट्रोल था ,किसी ने निकाल लिया क्या ! या फिर किसी ने इसका बहुत ज्यादा इस्तेमाल किया होगा। मुझे एक बार घर से निकलते समय देख लेना चाहिए था। अब क्या करूँ ? मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है ? 

वह दिन - एक सच्चा अनुभव
मोटरसाइकिल चलाना 

ऐसे समय पर भगवान की याद आ ही जाती है। मैंने भी मन ही मन भगवान को याद किया और कहा हे भगवान कैसे भी ये मोटरसाइकल चालू हो जाये और मैं पेट्रोल पंप तक पहुँच जाऊँ। भगवान से ऐसे प्रार्थना करने के बाद मैंने मोटरसाइकिल को किक मार कर चालू करने की बहुत कोशिश किया लेकिन मोटरसाइकल चालू नहीं हुई। और फिर मैंने ये मान लिया की पेट्रोल ख़त्म हो चूका है मोटरसाइकल ऐसे नहीं चलने वाली। 

आखिर मुझे चलना तो है ही क्योंकि पेट्रोल पंप रास्ते में ही है लेकिन यहाँ से काफी दूर है। वो साल २०१९ का समय था , गर्मी के दिन थे ,उस दिन धुप भी बहुत थी। रास्ता भी काफी लम्बा था क्योंकि मोटरसाइकल को धक्का मार कर ले जाना था। जल्दी भी पहुंचना था दुकान पर। दुकान से लौटने के बाद थोड़ा आराम करके अपने ऑफिस भी जाना था। मेरा ऑफिस दोपहर से शुरू होता था। 

वह दिन - एक सच्चा अनुभव
मोटरसाइकिल को धक्का मारते हुए चलना 

फिर सोचा इतना सोचने के बजाय पहले पेट्रोल पंप पर पहुंचना चाहिए। मैंने सोचा धक्का मार कर ले जाने के बजाय मोटरसाइकल पर बैठकर पैरों से चलाता हूँ इससे थकावट भी थोड़ी कम होगी वैसे भी जब बचपन में साइकिल चलाना सीख रहा था तो शुरुवात इसी तरह से किया था। 

फिर क्या था ,मैं मोटरसाइकल पर बैठा और पैरों की मदद से मोटरसाइकल चलाते हुए आगे बढ़ने लगा। कुछ देर मैं पैरों की मदद से मोटरसाइकल की स्पीड तेज़ करता और फिर पैर ऊपर कर लेता जैसे की मोटरसाइकल में पेट्रोल खत्म नहीं हुआ है और मैं आराम से चला रहा हूँ। कुछ लोग मुझे देख रहे थे और उन्हें बहुत अजीब भी लग रहा था। अब उन्हें अजीब लगे तो इसमें मैं क्या कर सकता हूँ मेरे आगे जैसे हालात थे मैं उस हिसाब से अपना काम कर रहा था। 

आगे चलते चलते एक ढलान आया मेरी मोटरसाइकल आराम से चलने लगी और मुझे अपने पैरों के इस्तेमाल की जरुरत नहीं पड़ी। इतनी गर्मी में पेड़ों की छाँव और रास्ते में  ढलान मिलने से थोड़ी राहत महसूस हुई और मोटरसाइकल चलाने में थोड़ा मजा भी आने लगा। 

वह दिन - एक सच्चा अनुभव
ढलान 

लेकिन ये मजा थोड़ी देर तक ही था। ढलान ख़त्म होते ही मुझे अपने पैरों का फिर से इस्तेमाल करना पड़ा। थोड़ी देर बाद धुप ,गर्मी और थकावट से मेरी हालत ख़राब होने लगी। फिर भी मैं चलता रहा सोचा हे भगवान कैसे भी पेट्रोल पंप तक पहुँच जाऊँ। उस समय किसी को फ़ोन भी नहीं कर सकता था। भतीजा स्कूल गया हुआ था, पापा भी कुछ काम से  कहीं दूर गए हुए थे , भाई दुकान छोड़कर नहीं आ सकता था ,ऐसा कोई दोस्त भी नहीं था जिसे मैं बुला सकूँ। उस समय सभी कहीं न कहीं व्यस्त थे। 

अब तो बस मैं भगवान को याद कर रहा था और जैसे तैसे चला जा रहा था। थोड़ी देर में पीछे से एक आदमी की आवाज आयी की तुम मोटरसाइकल से ऐसे क्यों चल रहे हो। मैंने पीछे मुड़कर देखा तो मोटरसाइकल पर बैठा एक बहुत की साधारण सा आदमी था। ढीला ढाला कुरता पैजामा पहने हुए था। पीछे ढेर सारे कपड़े बांध रखे थे। शायद कपड़े बेचने वाला था। मैंने उसकी तरफ देखते हुए कहा क्या करूँ मोटरसाइकल का पेट्रोल ख़त्म हो गया है। उसने कहा मैं मदद करता हूँ तुम अपने पैर ऊपर कर लो और हैंडल पर ध्यान दो। मैंने वैसा ही किया। वह अपनी मोटरसाइकल स्टार्ट करके पीछे से मेरी मोटरसाइकल को पकड़ लिया और इस तरह से मेरी मोटरसाइकल चलने लगी। 

वह दिन - एक सच्चा अनुभव
पीछे देखना 

मैंने मन ही मन भगवान को शुक्रिया कहा और सोचा ये आदमी  कितना अच्छा है अब मैं जल्दी से पेट्रोल भराकर दुकान पहुँच जाऊंगा। इस दुनिया में इंसानियत है और भगवान भी। पेट्रोल पंप पर पहुँचने के बाद वो आदमी बोला की हम पेट्रोल पंप पहुँच गए । पेट्रोल भरा लो। और जाते जाते मैंने सिर्फ शब्दों से ही नहीं बल्कि दिल से उसे कहा की भगवान आपका भला करे। वह आदमी जाते जाते मेरी तरफ देखा और शायद मुस्कुराया भी और चला गया। मैंने भी पेट्रोल भराया और दुकान की तरफ चल पड़ा।  

वह दिन - एक सच्चा अनुभव
भगवान पर भरोसा

मेरे साथ हुई इस सच्ची घटना ने मुझे ये समझा दिया की हमे भगवान पर भरोसा होना चाहिए। हालात कैसे भी हो हमें हिम्मत नहीं हारना चाहिए और कोशिश करते रहना चाहिए। इस दुनिया में इंसानियत है और अच्छे इंसान भी। वो साधारण सा दिखने वाला इंसान उस समय मेरे लिए किसी फरिस्ते से कम नहीं था। 

वैसे आज कल कोरोना महामारी का समय चल रहा है। फिर भी न्यूज़ चैनलों में ,अख़बारों में ज्यादातर सिर्फ नफरत फ़ैलाने की खबर चलती रहती है। लोग उलझन में है मजहब को लेकर ,राजनीतिक सोच को लेकर और आपस में बंटे भी हुए हैं। लेकिन इस घटना को याद करते हुए मेरे मन में ये सवाल भी उठता है की अगर हम सबके अंदर उस आदमी जैसे इंसानियत की और सबकी मदद करने की भावना हो तो हमे क्या फर्क पड़ता है की हमारा मजहब क्या है ,हमारा इतिहास क्या है ,हम अमीर हैं या गरीब। 

वह दिन - एक सच्चा अनुभव
सबकी मदद करने की भावना

हम किसी राजनीतिक पार्टी के बहकावे में आकर कोई गलत नेता चुनने के बजाय इंसानियत के आधार पर कोई नेता चुनें जो इंसानियत की भावना से प्रेरित होकर सबके लिए अच्छा काम करे। और रही बात भगवान की वो तो हमारे मन में ही है जब चाहे बात कर लो। कोई शिकायत हो तो शिकायत कर लो। क्या फर्क पड़ता है किसी मंदिर ,मस्जिद या किसी तरह की ईमारत से। हम भगवान से जब चाहें खुद बात कर सकते हैं हमे किसी और की जरुरत ही नहीं है। 

वह दिन - एक सच्चा अनुभव
इंसानियत की भावना

वैसे ये घटना मुझे न्यूज़ चैनल्स को देखकर याद नहीं आयी। दरअसल लॉक डाउन और नौकरी न होने की वजह से मेरा कहीं आना जाना नहीं रहता है। लेकिन कल किसी जरुरी काम से मुझे बाहर निकलना पड़ा और उसी जगह से गुजरना पड़ा और उस दिन की याद ताज़ा हो गयी। मैंने सोचा की इस घटना को लिखना चाहिए और शेयर भी करना चाहिए। 

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