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मैं गुजरा हुआ कल हूँ

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पुराने दिनों को याद करते करते जो बिछड़ गए हैं साथ चलते चलते  उनसे दुबारा उसी तरह मिलने की फरियाद करते करते  मुझे ये भी एहसास हुआ की   मैं भी किसी के लिए गुजरा हुआ कल हूँ, आज नहीं बन सकता  यादों में आकर अपने होने का एहसास दिला सकता हूँ  लेकिन वर्तमान में साथ नहीं चल सकता  मिल सकता हूँ अपने हालात से लड़ते हुए दुबारा  रुक सकता हूँ पल दो पल और दे सकता हूँ जरुरत पड़ने पर साथ तुम्हारा  लेकिन ये भी सही है की मैं गुजरा हुआ कल हूँ ,आज नहीं बन सकता  आप ये वीडियो भी देख सकते हैं 👇 मैं गुजरा हुआ कल हूँ तुम मुझे कितना भी यादों में बसालो ,दिल से अपनालो या फिर भुला दो  कभी ना कभी याद आता रहूँगा लेकिन यही कहूँगा मैं कितना भी याद आऊँ यादों में मुझे रखते हुए कदम आगे बढ़ा दो  क्योकि ये मज़बूरी ही सही, बिना कदम आगे बढ़ाये जीवन नहीं चल सकता  मैं गुजरा हुआ कल हूँ ,आज नहीं बन सकता    पुराने दिनों की यादें आती रही दिलों पर छाती रही आज की दुनियां से हमें अलग हटाती रही  उन यादों को याद करते करते न जाने कितने आज गुजर गए  उन यादो...

व्यवहारिक जीवन में आत्मविश्वास को समझें ,अपनाएं और जीवन में सफलता पाएं

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स्कूल के दिनों के बात है। एक दिन ब्रेक खत्म होने के बाद हमारे एक सर बहुत ही गुस्से में क्लास में आये और सबको डाटने लगे की मना करने के बावजूद भी ग्राउंड के बाहर जाकर बेर किसने तोड़े हैं। कई लोग एक लड़की की तरफ देखने लगे और सर को ये इशारा मिल गया की इसने ही तोड़ा होगा। सर उस लड़की को डाँटने लगे। शुरू में तो वो लड़की मना करती रही की मैंने बेर नहीं तोड़ा है लेकिन जब सर का डाँटना बंद नहीं हुआ तो उसने बड़े ही   आत्मविश्वास  से अपना बैग सर के सामने टेबल पर रख दिया और बिना डरे बड़े ही आत्मविश्वास के साथ बोलने लगी की अगर मैंने बेर तोड़े हैं तो इस बैग में ही होंगे जिसको शक है वो इस बैग में देख ले। उसके ऐसा करते ही सर शांत हो गए और समझाने लगे की मैं सिर्फ तुमको ही नहीं बोल रहा था। सभी को बोल रहा था। जो भी अब ग्राउंड के बाहर बेर तोड़ने जायेगा उसकी खैर नहीं इसलिए जो कोई भी था अभी से सुधर जाओ। बाद में पता चला की बेर उस लड़की ने ही तोड़े थे। वो बेर उसके बैग में ही थे। लेकिन उसने इतने आत्मविश्वास से वो बैग सामने रखा और झूठ बोला की किसी के अंदर उसको गलत साबित करने की हिम्मत ही नहीं हुई और हमारे सर भी शां...

कोशिश फिर भी जारी है

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बचपन चला गया  दोस्त बदल गए  लोग बदल गए  समय बदल गया  सुकून भरी वो शाम  अच्छे लगने वाले वो रोज बदल गए  चंद रुपयों के खातिर मजबूर हूँ ,तिल तिल कर जीने के लिए  इस कंक्रीट के जंगल में  बहुत कोशिश किया लेकिन नहीं ला पाया वो सुकून भरा और अपनापन वाला समय  कोशिश फिर भी जारी है  समझ गया हूँ लेकिन किसी को समझा नहीं पाया की असली सुकून भरी जिंदगी इन बड़ी बड़ी ईमारतों में नहीं , एसी के कमरों में नहीं , स्विमिंग पुलों में नहीं , महँगे होटलों और वहां के खानों में नहीं है  ये सब तो कुछ दिनों के लिए ही सही है  असली सुकून है उस गांव में जहाँ  अपनेपन वाला संस्कार है ,खुला आँगन है , जहाँ के चूल्हों पर बिना मिलावट वाला शुद्ध खाना बनता है  जहाँ के नदियों के पानी में कुदरत का अपनापन झलकता है   सोच रहा हूँ कहाँ खोजूँ वो गांव  अपनापन से भरे परिवारों वाले वो गांव बदल गए  समझ गया हूँ लेकिन किसी को समझा नहीं पाया कोशिश फिर भी जारी है  पढ़ी लिखी जनसंख्या है लेकिन समझ कर बदलाव कोई नहीं लाना चाहता है  डिग्री लेकर हर कोई ...

जब डर सताए तो क्या करें

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मन में डर एक शरारती बंदर की तरह होता है। जब भी जीवन में कोई समस्या आये ये बहुत तंग करता है। ये हावी हो जाता है हमारे मन पर ,हमारे सोच पर। यह हमें सही सोचने ही नहीं देता है। यह हम पर दबाव डालता है मुसीबत के आगे झुकने के लिए।   ये एक आँधी की तरह आता है और मन या दिमाग के अंदर हाहाकार मचाकर चला जाता है फिर से आने के लिए। इसको हराने के बाद ये फिर से और पहले से ज्यादा तेज़ी से हमला करता है। बार बार हमला करता है ऐसे ही चलता रहता है। इस समय सबसे जरुरी होता है इस डर पर काबू रखते हुए सही निर्णय लेना। क्योंकि होता ये है की इस समय हमारे निर्णय लेने की क्षमता सबसे ज्यादा प्रभावित होती है। हमे समझ में ही नहीं आता की हम क्या करें और क्या नहीं करें। आसपास अगर राय देने वाले लोग हो तो इस समय हमे समझ में ही नहीं आता की कौन सही राय दे रहा है और कौन गलत राय दे रहा है। हम अपने जीवन में गलत निर्णय ज्यादातर इसी हालत में करते हैं जैसे की- गलत रोजगार चुनना  - गलत रोजगार चुनने की शुरुआत तभी से शुरू हो जाती है जब हम विद्यालय की शिक्षा प्राप्त करने के दौरान बड़ी कक्षाओं में पढ़ते हैं। क्योंकि ज्यादातर हम...

क्या फिर से वो दिन आएंगे

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क्या फिर से वो दिन आएंगे  एक दूजे को गले लगाएंगे  दिन भर की सारी उलझन चाँद तारों की तरफ देखते ही  कहीं खो जायेंगे  कभी लाइन में चलती चींटियां देखकर  कभी खेतों की तरफ बहता पानी देखकर  कभी उड़ती तितलियाँ देखकर  कभी नीम ,पीपल, आम के पेड़ों के छाँव में तो  कभी लहराते हुए हरे भरे  खेतों से बहती हुई मस्त हवा को महसूस  करते हुए मन को बहलायेंगे  क्या फिर से वो दिन आएंगे  बहती थी जब आंधी ,दुनिया की परवाह किये बिना हम बगीचे में आम बटोरने  जाते थे  पेड़ के पके हुए शुद्ध आम क्या हम फिर से खा पाएंगे  क्या फिर से वो दिन आएंगे  कभी आइसक्रीम ,कभी भुट्टे ,कभी नहाने से कतराना ,कभी तालाब में दौड़कर  जोर से छलांग लगाना  क्या फिर से हर मौसम का वैसे ही मजा ले पाएंगे  क्या फिर से वो दिन आएंगे  ना कोई बड़ा था ना कोई छोटा था  ना कोई अमीर था ना कोई  गरीब   रूठ भी जाते थे और मान भी जाते थे  सच्चे थे सब दिल के, एक दूसरे पर जान छिड़कते थे क्या जीवन में वो अपनापन फिर से ला पाएंगे  क्या फिर से ...

जिंदगी में बोल्ड यानि साहसिक कदम भी उठाना चाहिए

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जिंदगी में बोल्ड यानि साहसिक कदम भी उठाना चाहिए लेकिन क्यों उठाना चाहिए। ये मैं आपको अपने बचपन में घटी घटना के माध्यम से बताना चाहूंगा।  मैं जब भी साइकिल का जिक्र करता हूँ तो गांव की वो शाम वाली घटना जरूर याद आती है जब साइकिल की चाबी गुम होकर फिर से मुझे मिल गयी थी।  हुआ ये था की उस समय मैं अपनी मम्मी और बड़े भाई के साथ गांव में रहता था। गांव में हमारे और भी रिश्तेदार थे और भाई बहन भी। मेरे पापा फ़ौज में थे तो कभी कभार या साल में एक बार छुट्टी आते थे। मैं और मेरा बड़ा भाई गांव से दूर जिले के स्कूलों में पढ़ने जाते थे। हम दोनों अलग अलग स्कूलों में पढ़ने जाते थे। मैं एक प्राइवेट स्कूल में पढता था और उसी स्कूल के बस में स्कूल जाता था। लेकिन मेरे बड़े भाई के स्कूल में बस की सुविधा नहीं थी इसलिए पापा ने बड़े भाई के लिए नया साइकिल ख़रीदा था। मुझे भी साइकिल का बहुत शौक था और नया -नया साइकिल  चलाना सीखा था। कभी कभी इधर उधर ठोंक भी देता था।  उस शाम को मुझे शौच के लिए गांव के बाहर खेतों में जाना था। उन दिनों गांव में शौचालय नहीं होते थे। होते भी थे तो बहुत कम घरों में। लोग ज्यादातर श...

व्यवहारिक जीवन और शिक्षा

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एक दिन दोपहर को अपने काम से थोड़ा ब्रेक लेकर जब मैं अपनी छत की गैलरी में टहल रहा था और धुप सेंक रहा था। अब क्या है की उस दिन ठंडी ज्यादा महसूस हो रही थी। तभी मेरी नज़र आसमान में उड़ती दो पतंगों पर पड़ी। उन पतंगों को देखकर अच्छा लग रहा था। उन पतंगों को देखकर मैं सोच रहा था ,कभी मैं भी जब बच्चा था और गांव में था तो मैं पतंग उड़ाने का शौकीन था। मैंने बहुत पतंगे उड़ाई हैं कभी खरीदकर तो कभी अख़बार से बनाकर। पता नहीं अब वैसे पतंग  उड़ा पाऊँगा की नहीं। गैलरी में खड़ा होना    पतंगों को उड़ते देखते हुए यही सब सोच रहा था। तभी मेरे किराये में रहने वाली एक महिला आयी हाथ में कुछ लेकर कपडे से ढके हुए और मम्मी के बारे में पूछा तो मैंने बताया नीचे होंगी रसोई में। वो नीचे चली गयी और मैं फिर से उन पतंगों की तरफ देखने लगा। मैंने देखा एक पतंग कट गयी और हवा में आज़ाद कहीं गिरने लगी। अगर अभी मैं बच्चा होता तो वो पतंग लूटने के लिए दौड़ पड़ता। उस कटी हुई पतंग को गिरते हुए देखते हुए मुझे अपने बचपन की वो शाम याद आ गई। हाथ में पतंग  मैं अपने गांव के घर के दो तले पर से पतंग उड़ा रहा था वो भी सिलाई वाली रील ...

जो जिंदगी है वो आज है

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जो जिंदगी है वो आज है। हम अकसर भविष्य के इंतज़ार में अपना आज भूल जाते हैं। हम सोचते हैं की आज रहने देते हैं। एक दिन आएगा जब हम मौज मस्ती से रहेंगे। गलत कहते थे वो लोग की आज तकलीफ झेलो कल मौज करना। सही तो ये है की मुसीबत भी आज है ,हल भी आज है ,मेहनत भी आज है और उसका फल भी आज है , लगता है जीवन को सही से जीने का यही राज है। फल से मेरा मतलब है की हम उस काम में कितना कामयाब होंगे ये तो भविष्य पर निर्भर है लेकिन अगर हम उस काम को आज कर रहे है तो हमारे मन में ये तसल्ली जरुर होगी की हाँ हम काम कर रहे है आगे जरुर अच्छा होगा।  आप वीडियो देख सकते हैं   👇 जो जिंदगी है वो आज है अपने इस मुद्दे को मैं अपने अनुभव के आधार पर बताना चाहूंगा जिससे की आप इसे अच्छे से समझ सकें  वैसे तो मैं हमेसा अपने घर के पास वाले बाजार में जाता रहता हूँ सामान खरीदने के लिए लेकिन आज शाम जब बाजार गया और एक दुकान से सामान लेकर निकला तो सोचा की चलो आज जरा बाजार की चहल पहल  देख लेता हूँ। स्कूल के दिनों में इस समय बाहर निकलने और चहल पहल देखने के लिए मन तरसता था।  एक समय था जब कभी कभी छुट्टियों में य...

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