समझ - बाप,बेटा और पेरेंट्स मीटिंग
बच्चों को भी धीरे धीरे भावनाएं समझ में आने लगती हैं अगर उन पर कठोर होने के बजाय उनसे घुल मिलकर रहा जाये बिलकुल एक अच्छे दोस्त की तरह। उनसे सही गलत की बात की जाये बिना किसी दबाव के और तनाव के और उन्हें डराने के बजाय प्यार से और सादे तरीके से व्यव्हार किया जाये। ऐसा मैंने उस दिन महसूस किया जब मैं ऑफिस से छुट्टी लेकर उसके साथ उसके स्कूल गया पेरेंट्स मीटिंग में। वो रात को ही डर रहा था पेरेंट्स मीटिंग के नाम से। लेकिन मुझे उसकी कमजोरी पता है। उस समय मेरी पत्नी भी मौजूद थी जब वो पेरेंट्स मीटिंग के नाम से डर रहा था। मैंने कहा की इसमें डरने वाली क्या बात है ? मैं जानता हूँ आपकी दो तरह की शिकायत आएगी ,एक तो राइटिंग की और दूसरी अगर आपने कोई शरारत या उल्टा काम किया होगा तो। राइटिंग की प्रक्टिस तो मैं आपको रोज करा ही रहा हूँ। ये सब देखकर और सुनकर पत्नी भी बेटे की तरफ देखकर मुस्कुरा रही थी। अगले दिन के लिए ये तय हुआ की अगर पत्नी को छुट्टी मिली तो वह भी साथ में चलेगी,अगर नहीं मिली तो भी वह फ़ोन करके मुझे बता देगी ,उसके बाद मुझे अकेले जाना होगा बेटे को साथ लेकर। अगल...