समझ - बाप,बेटा और पेरेंट्स मीटिंग
बच्चों को भी धीरे धीरे भावनाएं समझ में आने लगती हैं अगर उन पर कठोर होने के बजाय उनसे घुल मिलकर रहा जाये बिलकुल एक अच्छे दोस्त की तरह। उनसे सही गलत की बात की जाये बिना किसी दबाव के और तनाव के और उन्हें डराने के बजाय प्यार से और सादे तरीके से व्यव्हार किया जाये।
ऐसा मैंने उस दिन महसूस किया जब मैं ऑफिस से छुट्टी लेकर उसके साथ उसके स्कूल गया पेरेंट्स मीटिंग में।
वो रात को ही डर रहा था पेरेंट्स मीटिंग के नाम से। लेकिन मुझे उसकी कमजोरी पता है। उस समय मेरी पत्नी भी मौजूद थी जब वो पेरेंट्स मीटिंग के नाम से डर रहा था।
मैंने कहा की इसमें डरने वाली क्या बात है ? मैं जानता हूँ आपकी दो तरह की शिकायत आएगी ,एक तो राइटिंग की और दूसरी अगर आपने कोई शरारत या उल्टा काम किया होगा तो। राइटिंग की प्रक्टिस तो मैं आपको रोज करा ही रहा हूँ।
ये सब देखकर और सुनकर पत्नी भी बेटे की तरफ देखकर मुस्कुरा रही थी।
अगले दिन के लिए ये तय हुआ की अगर पत्नी को छुट्टी मिली तो वह भी साथ में चलेगी,अगर नहीं मिली तो भी वह फ़ोन करके मुझे बता देगी ,उसके बाद मुझे अकेले जाना होगा बेटे को साथ लेकर।
अगले दिन मैं तैयार था और मेरा बेटा उत्सुक था ,क्योंकि वो जानता था की पापा मेरे साथ प्यार से ही पेश आएंगे और पेरेंट्स मीटिंग के बाद मुझे घुमाने भी ले जायेंगे।
पत्नी का फ़ोन आया की उसको छुट्टी नहीं मिलेगी। अब बेटे को लेकर मुझे ही जाना होगा।
समय होने पर मैं भी बेटे को साथ लेकर निकल पड़ा मोटरसाइकिल चलाते हुए , स्कूल की तरफ।
जैसे जैसे हम स्कूल की तरफ बढ़ रहे थे वैसे वैसे मुझे भी थोड़ा डर और तनाव तो महसूस हो ही रहा था जैसे मुझे मेरे स्कूल के दिनों में महसूस होता था पेरेंट्स मीटिंग के समय
लेकिन अब ये भी समझ में आता है की सबकुछ एकदम परफेक्ट तो कभी नहीं होता। मैं अपने पेरेंट्स जैसा नहीं हूँ जो टेंशन लूंगा और हायतौबा करूँगा।
मैं तो मीटिंग में आया ही इसलिए हूँ की उसकी टीचर के साथ कोआपरेट कर सकूँ और क्या कमी है और उसके लिए क्या करना है समझ सकूँ। ऐसा सोचते हुए मैं अपने डर पर काबू कर लेता हूँ।
पेरेंट्स मीटिंग में वही हुआ जिसका मुझे अंदाजा था। बेटे का रिजल्ट एवरेज से थोड़ा अच्छा था राइटिंग की समस्या के कारण लेकिन उसको ओरली सब आता था।
उसकी क्लास टीचर से भी मेरी इसी मुद्दे पर बात हुई और मेरी पत्नी ने भी फ़ोन पर क्लास टीचर से बात किया। आखिर मेरी पत्नी भी टीचर है किसी दूसरी स्कूल में।
मैंने टीचर के कुछ बोलने से पहले ही बता दिया की राइटिंग की प्रॉब्लम है और मैं रोज ऑफिस से आते ही इसकी राइटिंग की प्रैक्टिस कराता हूँ।
मीटिंग ख़त्म होने के बाद बेटा स्कूल के झूलों पर खेलने कूदने लगा। मैंने अपने स्मार्टफोन से उसके कुछ फोटो खींचे और बेटे को लेकर आगे चल पड़ा।
बेटा स्कूल के कैंटीन से कुछ खाने की जिद करने लगा। लेकिन जिस जगह को वो कैंटीन समझ रहा था वो वहां के हॉस्टल वालों के लिए डाइनिंग एरिया था।
मैंने उसे बताया की ये कैंटीन नहीं है यहाँ हॉस्टल वालों के लिए खाना बनता है और ये हॉस्टल वालों के बैठकर खाना खाने की जगह है।
बेटे ने अपने एक दोस्त का नाम लेते हुए बताया की वो तो यहाँ से खाने की चीज़ें खरीदता है। मैंने कहा हो सकता है उसने यहाँ से लिया हो लेकिन आज तो छुट्टी वाला दिन है ना इसलिए बंद होगा ,चलो बाहर से ले लेंगे।
स्कूल घूमने के बाद हम बाप बेटे अपनी मोटरसाइकिल पर निकल पड़े थोड़ा और घूमने और कुछ हल्का फुल्का खाने।
वैसे कुछ साल पहले तक मैं इन सब मामलों में बहुत स्ट्रिक्ट था। स्कूल के दिनों में मैं सीधा स्कूल से घर और कॉलेज के दिनों में भी मैं कॉलेज से सीधा घर चला जाता था। पुरानी जॉब में भी शुरुवाती दिनों में मैं ऑफिस से निकलने के बाद सीधा घर चला आता था।
समय गुजरने के साथ ये एहसास हुआ की मैं पहले किताबों में उलझा रहा और अब मशीन की तरह जी रहा हूँ। जिसके कारण जिंदगी उबाऊ और बोझ सी लगने लगी।
अब समझ में आता है की जिंदगी थोड़ा काम करने के साथ साथ खुलकर जीने के लिए होती है।
जो समय बीत गया सो बीत गया अब मैं ऐसा कोई मौका नहीं छोड़ता हूँ जिसमें मुझे कहीं घूमने को और जिंदगी को थोड़ा एन्जॉय करने का मौका मिलता है जैसे की आज मैं अपने बेटे को लेकर जा रहा हूँ इस इलाके के मार्केट की तरफ।
लेकिन मार्केट घुमाने से पहले मैं अपने बेटे को दो मंदिरों में ले गया और दर्शन कराया।
वैसे मैं अब ये सब मंदिर , मस्जिद या इस तरह के किसी भी चीज़ में पहले जैसा विश्वास नहीं रखता। लेकिन हर जगह श्रद्धा से सर झुकाता हूँ। क्योंकि मैं बचपन से ही मंदिर ,भगवान इत्यादि से जुड़ा हुआ हूँ और ऐसे ही माहौल में बड़ा हुआ हूँ इसलिए इन सबसे एक भावनात्मक लगाव महसूस करता हूँ।
मैं आज तार्किक तरीके से सोचता हूँ तो लगता है की दुनिया को चलाने वाला भगवान् या कोई ऊर्जा जरूर है लेकिन ऐसा नहीं है जैसा की दुनिया के लोगों ने बातें फैला रखी हैं। लेकिन फिर भी मैं अपने बेटे को मंदिर ले जा रहा हूँ क्योंकि मैं आज इतने लॉजिकल तरीके से इसलिए भी सोच लेता हूँ क्योंकि मुझे कभी किसी ने धार्मिक बातों को सुनने और देखने से कभी नहीं रोका।
मैंने सिर्फ अपने परिवार से मिले हुए हिन्दू धर्म के बारे में ही नहीं बल्कि अपने स्कूल के दिनों में लगभग हर धर्म के बारे में बेसिक जानकारी ली है। सभी के बारे में पढ़ा है।
यही सोचकर अपने बेटे को मंदिर या ऐसी किसी भी जगह जाने से नहीं रोकता की अगर मुझे रोका गया होता तो मैं कभी सही जानकारी नहीं ले पाता और आज जिस तरह से सोच पाता हूँ नहीं सोच पाता। हो सकता है मैं भी अंधभक्त या कट्टरपंथी विचारधारा का होता।
मैं लॉजिकल तरीके से इसलिए भी सोच पाता हूँ क्योंकि मुझे सबकुछ के बारे में पढ़ने दिया गया और मुझे सभी के बारे में जानकारी है की कहाँ क्या गलत है और क्या सही है।
आज अगर अपने बेटे को रोकूं तो उसमें और इंटरेस्ट पैदा होगा। इससे अच्छा है सब चीज़ का उसे अनुभव कराऊँ और जानकारी दूँ। वैसे और कुछ हो ना हो कोई भी धर्म नैतिक मूल्यों की जानकारी देता ही है।
मुझमें भी जो नैतिक मूल्य विकसित हुए हैं उसके पीछे इन अलग अलग धार्मिक किताबों व कहानियों का भी योगदान है।
दोनों मंदिरों में दर्शन के बाद मैं अपने बेटे को बाज़ार घुमाते हुए आज के बाजार के हिसाब से विकसित होते मॉल कल्चर को दिखाने के लिए एक इलेक्ट्रॉनिक्स के मॉल में भी ले गया।
वैसे बेटा भी जिद कर रहा था मॉल में घूमने के लिए और वो इलेक्ट्रॉनिक्स वाले मॉल में पहले नहीं गया है और लगता है बहुत दिनों से इसके मन में इच्छा है इलेक्ट्रॉनिक्स के मॉल में घूमने की।
मैंने सोचा चलो घुमा देता हूँ मॉल में आखिर इसे हर चीज़ का अनुभव और जानकारी देना मेरा फ़र्ज़ भी है और घूमने का मौका भी और मैं ऐसे मौके अब छोड़ता नहीं हूँ। भले ही कुछ खरीदूं या ना खरीदूं लेकिन घूमता जरूर हूँ और जानकारी भी लेता हूँ।
ऐसा मार्गदर्शन मेरे एक गुजराती दोस्त ने मुझे दिया था।
ये उन दिनों की बात है जब मैं कुछ साल पहले रोजगार के लिए गुजरात में था और वो मेरा रूम पार्टनर था। जब छुट्टी होती थी वो मुझे साथ लेकर ज्यादातर पास के ही माल में घूमता था। ऐसे ही एक दिन घूमते हुए पूछने पर उसने मुझे बताया था की भले ही कुछ खरीदो या ना खरीदो लेकिन मार्केट में घूमते रहना चाहिए ताकि मार्केट में क्या नया हो रहा है पता चले।
और तबसे मैं अपने उस दोस्त के बताये हुए तरीके का पालन करता हूँ दिल से। इससे घूमना भी हो जाता है ,मन भी बहल जाता है और सच में मार्केट में आयी हुई चीज़ों की जानकारी भी मिल जाती है और उनकी कीमतों की भी। और उन चीज़ों के कीमतों को देखकर ये भी समझ में आ जाता है की मैं कितना गरीब हूँ।
खैर बेटे को मॉल घुमाने और अपनी गरीबी का आकलन करने के बाद मैं अपने बेटे को एक बढ़ियां से रेस्टोरेंट में ले गया और उसके पसंद का आर्डर देने के बाद मैंने उसे प्यार से समझाया की उसमें क्या कमी है और उसे उस कमी को कैसे सुधारना है। उसके बाद इधर उधर की बातें चलती रही। फिर थोड़ी देर में उसके पसंद का आर्डर आया और वो खाने में लग गया। मैंने उसमें से थोड़ा सा चखा और अपने विचारों में खो गया और वो खाने में लगा रहा।
हालाँकि मैं इसके साथ बहुत खुश रहता हूँ और इसके साथ जिंदगी खुलकर और ख़ुशी से जीने की पूरी कोशिश करता हूँ। लेकिन अब तक के मेरे जीवन में ऐसा बहुत कुछ हो चूका है जिसका एहसास होते ही मैं अपने आप में बहुत गंभीर हो जाता हूँ और खो सा जाता हूँ।
उस दिन भी ऐसा ही हुआ बेटे को खाना दिलाने के बाद मैं अपने विचारों में खो गया।कभी अपने करियर के बारे में सोचता हूँ जो की पहले से थोड़ा बहुत ठीक है लेकिन भविष्य बहुत साफ़ है और भविष्य में बहुत अच्छा होने की उम्मीद है लेकिन वर्तमान चुनौतियों से भरा हुआ है। एक चुनौती को समझकर उपाय सोचो तब तक दूसरी चुनौती खड़ी हो जाती है ऊपर से गांव की भी बहुत याद आती है और बीती रात गांव से एक बुरी खबर भी आयी हुई है।
इन्ही सब में उलझा हुआ था की अचानक बेटे की आवाज आयी की पापा आप भी खा लो। मैंने उसकी तरफ देखा ,वो मेरी तरफ देख रहा था , उसके एक्सप्रेशन को देख कर लग रहा था की उसे एहसास हो रहा था की पापा उदास हैं और मैं अकेले खा रहा हूँ , पापा नहीं खा रहे हैं।
वैसे मुझे ताज्जुब तो हुआ क्योंकि मैं जानता हूँ के ये बहुत पेटू है और किसी से भी अपना खाना शेयर करना पसंद नहीं करता है।
उस दिन अचानक उसका ऐसा व्यवहार देखकर मुझे अजीब लगा। मैंने कहा की आप खालो मैं नहीं खाता ये सब। फिर उसने कहा मेरा पेट भर गया है अब नहीं खाऊंगा।उसका ये जवाब भी मुझे अचरज में डाल गया ,क्योंकि इससे पहले वो कभी ऐसी बात नहीं बोला और ना ही बिना मांगे खाना शेयर करता है।
मैंने गौर किया तो समझ में आया की बेटा अब जल्द ही आठ साल का हो जायेगा और मैं जिस तरह से इससे घुल मिलकर रहता हूँ और कोई भी बात सहज और दोस्ताना तरीके से समझाता हूँ ये उसी का असर हो रहा है। यानि की उम्र के साथ साथ उसे जो वर्तमान मिला रहा है उसके कारण ही उसके स्वभाव में ये बदलाव आ रहा है।
सही है बच्चों के साथ कठोर होने के बजाय जितना हो सके घुलमिलकर रहो और बिना किसी दबाव के अच्छी और बुरी बातों की जानकारी दो और समझाओ तो उनके व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन आता है और वो अपने बड़ों की इज़्ज़त और चिंता करने लगते हैं बिना किसी के बताये और सिखाये हुए।
इसके आगे हुआ ये की हम बाप बेटे अपने मोटरसाइकिल पर सवार होकर घर की तरफ निकल पड़े। लेकिन बेटा अपनी मम्मी से थोड़ा डरा हुआ था और उसका कहना था की आपने मम्मी को मैडम से क्यों बात कराया मेरी राइटिंग के बारे में जानकर वो घर आने के बाद मुझपर गुस्सा करेंगी। फिर मैंने बेटे को समझाया की मैंने आपकी मम्मी से इसपर बात कर लिया है पहले ही,वो गुस्सा नहीं करेंगी बस आप अपनी प्रैक्टिस पर ध्यान दो और सुधार करो।
और अंततः ऐसा ही हुआ बेटा खुशी से उछलता हुआ मेरे कमरे में मेरे पास आया और बोला की आपने सही कहा था मम्मी गुस्सा नहीं हुई और मुझे रोज प्रैक्टिस करने के लिए कहा।















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